अनभव और विवेक की काव्य-नदी

एक ऐसे दौर में, जब समाज और राजनीति में एक वचन और एक रंग पर जोर है, लीलाधर जगूड़ी को उनके काव्य संग्रह 'जितने लोग उतने प्रेम' पर व्यास सम्मान दिए जाने का प्रतीकार्थ ढूंढा जा सकता है यह होगा बहवचनिकता की स्वीकति । यही संण्ड नहीं, जगूड़ी का सारा रचनाकर्म मानवीय बहवचनात्मकता को समद्ध करता है और उसके पक्ष में प्रतिबद्ध है। 75 बरस पार कर चके एक कवि लिए यह एक दर्लभ उपलब्धि है, जब समकालीनता उसे अपना संगी-साथी और हमसफर समझे। किन्तु इतना ही नहीं, जगूड़ी की कविता लगभग पिछले साठ बरस की हिंदी कविता की सहधर्मी भी है और खास मौकों पर उसे अगवाई देने वाली कविता है। इसी के साथ जुड़ी है कवि की अदम्य रचनाशीलता। जगूड़ी जैसी जीवन भख और रचनात्मक सक्रियता दर्लभ हैनियमित अंतराल पर समर्थ और प्रयोगशील कविता के योगदान के द्वारा वे हिंदी के साहित्यिक और अकादमिक दायरों में निरंतर प्रासंगिक और चर्चित बने रहे हैं।धूमिल के आगमन के साथ, पिछली सदी के सातवें दशक में, हिंदी कविता में एक मोड आता है: एक आक्रामकता. सपाटबयानी और काव्य कथन का एक नया महावरा उसे परिभाषित करता है। इस कविता का यथार्थबोध ज्यादा बेलौस. नंगा और चीरने वाला है। रघवीर सहाय और विनोद कमार शक्ल साथ लीलाधर जगडी भी इस नए परिवर्तन को संवारने वालों में से एक हैं। इन सबके अपने विशिष्ट हस्ताक्षर भी हैं हिंदी कविता पर, जो युग के होकर भी उससे अलग नज़र आते हैं। टिहरी गढ़वाल के निवासी जगूड़ी की आक्रामकता कभी भी पहाड़ी भद्रता, राग और संवेदनशीलता को नहीं छोड़ सकी; इसलिए अराजक नहीं हुई। उनकी कविता सपाटबयानी को अर्थ के स्तर पर तो निभाने का उद्यम करती रही लेकिन अभिव्यक्ति के स्तर पर वे परंपरागत और प्रयोगधर्मा , काव्य उपकरणों के साथ एक नई काव्य भाषा की तलाश करते रहे हैं। इस मामले में वे पिछली शताब्दी के आठवें और नवें दशक में बताई गयी कविता की वापसी के समय के अग्रदूत कहे जा सकते हैं। नदी, पहाड़, पेड़, बच्चे, चिड़िया, मां और पिता जैसे अनेक प्रतीक सबसे पहले शायद जगूड़ी की कविता में ही नज़र आये हैं। एक ओर वे धूमिल के कठोर यथार्थ के चित्रण की परंपरा में नाटक जारी है, इस यात्रा में, रात अब भी मौजूद है जैसे हृदय विदारक संग्रह सामने लाते हैं; दूसरी ओर, बची हुई पृथ्वी, घबराए हुए शब्द, भय भी शक्ति देता है जैसे संग्रहों के माध्यम से हिंदी कविता को भाषा का एक नया आकाश प्रदान करते हैं जो पूर्ववर्ती अकविता के भदेस से उत्पन्न थकान को हरने वाला है।यह तथ्य नहीं भुलाया ! जा सकता कि जगूड़ी पहाड़ के कवि हैं- पहाड़ के अपने कवि। जगूड़ी के पहाड़ और जंगल साधारण जीवन के संघर्ष से जिस प्रकार लथपथ हैं, चिपको आन्दोलन की तस्वीरों में नजर आने वाली जुझारू पहाड़ी औरतों की याद दिलाते हुए, वह भी हिंदी कविता में अब तक दुर्लभ था। समकालीन हिंदी कविता में पहाड़ की एक नई और अनोखी दुनिया उतरती है जगूड़ी के साथ, जिसे आगे बढ़ने का काम मंगलेश डबराल और वीरेन डंगवाल जैसे लोग करते हैं और अब उसी परम्परा को पड़ोस के हिमाचल के समर्थ हिंदी कवि आगे बढ़ा रहे हैं। मौजूदा हिंदी कविता में पहाड़ की कविता का एक भरा-पूरा और विविध रंगी संसार है और जगूड़ी को इस संसार का पितामह कहा जा सकता है। उल्लेखनीय है कि जहां बहुतेरे गैरपहाड़ी कवियों के लिए पहाड़ बिम्ब-प्रतीक और आदिम ! आकर्षण की अद्भुत दुनिया है वहां जगूड़ी की कविता में पहाड़ एक सघन, आच्छादित करने वाला, मानवीय और प्राकृतिक जीवन-परिवेश भी है, जिसके भीतर प्रवेश करना । चेतना को बदलने वाला अनुभव है। जगूड़ी उन विरले समकालीन काव्य-पुरुषों में भी हैं, जिन्होंने गद्य की दुनिया में हाथ आजमाने को कभी तरजीह नहीं दी और लगभग पूर्णतया । कविता लेखन को समर्पित रहे। अलबत्ता उनके प्रकाशित साक्षात्कार पढ़ना एक अत्यंत रंजक और व्यंजकतापूर्ण गद्य । से गुजरना है। उनके कथन वहां भी कवि की आंख से देखे गए सत्य को प्रकट करते हैंसाथ ही उनकी दार्शनिक प्रवृत्तियों और विस्तृत ज्ञान का पता भी चलता है हिंदी कविता में लीलाधर जगूड़ी एक ताजा हवा की तरह आये थे, जिसमें जंगल की सच्चाई और नदी की रवानगी थी। हिंदी कविता का सौभाग्य है कि उस नदी की कल-कल की आवाज़ अभी भी । हमारे कानों में आ रही है। इस काव्य-नदी ने हमारे चहंओर फैले पाखंड और झूठ को धोने और साफ़ करने की भी कोशिश की है।